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कुंभ में काफी संख्या में दिखाई देने वाले नागा साधुओं की दुनिया बड़ी ही विचित्र और रहस्यों से भरी होती है। एक ओर जहां अर्धकुंभ, महाकुंभ में ये निर्वस्त्र रहकर हुंकार भरने के अलावा शरीर पर भभूत लपेटते हुए नाचते गाते बड़ी संख्या में दिख जाते हैं, वहीं कुंभ खत्म होते ही ये कहां गायब हो जाते हैं, ये एक रहस्य की तरह है। ऐसे में आज हम आपको बता रहे है नागाओं (aghori baba) की रहस्यमयी दुनिया का सच? कि आखिर ये कहां से आते हैं और कहां गायब हो जाते हैं…

ऐसे में हरिक्षर में चल रहे महाकुंभ में एक बार फिर नागा साधु दिखाई दे रहे हैं, दरअसल देश में कंही भी कुंभ या अर्ध कुंभ का अयोजन होते ही, नागा साधु अचानक से प्रकट हो जाते है। और कुंभ की समाप्ति होते होते ये फिर न जाने कहा गायब हो जाते है। जबकि इसके बाद नागा साधुओं के अगले कुंभ में ही दर्शन होते है। इस बीच वह कहां रहते हैं,क्या करते हैं या क्या खाते हैं, शायद ही आपको मालूम हो।

दरअसल नागा साधुओ के बारे में कहा जाता है, कि ये दिन रात यानि की चौबीस घंटो में केवल एक बार ही भोजन करते है। गुरु परम्पराओ के अनुसार ये केवल भिक्षा मांग कर ही अपना पेट भरते है। इतना ही नहीं नागा साधु अपनी दिनचर्या में केवल सात घरों से ही भिक्षा मांगते हैं। इन घरो से जो भी प्राप्त होता है।

उसी से यह अपना गुजारा करते हैं। वहीं यदि सात घरों से उन्हें पर्याप्त भिक्षा नहीं मिलती है, तो इन्हें को भूखा ही रहना पड़ता है। लेकिन, वेह आठवें घर में कभी भी भिक्षा मांगने नहीं जाते हैं। भिक्षा में मिले किसी भी तरह के भोजन में वह पसंद या न पसंद का सवाल नहीं उठाते, बल्कि भगवन भोले की इच्छा समझ उसका ही भोग लगाते हैं।

बताया जाता है कि नागा साधुओं को अपने सन्यासी जवान में बहुत ही कठिन नियमो का पालन करना होता है। सन्यासी जीवन के अनुसार वह गृहस्थ जीवन की तरह पलंग, चारपाई या किसी अन्य बिस्तर पर नहीं सो सकते हैं। ऐसे में वह सिर्फ जमीन पर ही सोते है, फिर चाहें कितनी भी सर्दी हो या फिर गर्मी। हर हालात में उनको सन्यासी जीवन का पालन करना ही होता है। इतना ही नहीं नागा साधू कभी भी अपनी पहचान को उजागर नहीं करते हैं। ये ज्यादातर अकेलेपन में रहना पसंद करते हैं। सांसारिक और गृहस्थ जीवन से इनका किसी तरह का कोई मोह नहीं होता है।

नागा साधुओ के बारे में सबसे दिलचस्प बात यह है, कि यह अपने सम्पूर्ण जीवन में कभी भी एक जगह नहीं रहते हैं। कुछ वर्षो तक यह एक जंगल या गुफा में रहने के बाद दूसरी नयी जगह के लिए निकल पड़ते है। इसी कारण आज तक किसी नागा साधु के किसी भी प्रमुख स्थान का किसी को पता नहीं है। आमतौर पर इन्हें कुंभ में देखा जाता है, जहां ये साधु निर्वस्त्र ही रहते हैं। हालांकि कुछ नागा साधु ऐसे भी हैं, जो वस्त्र धारण करते हैं।

मान्यता के अनुसार कहा जाता है, कि नागा साधु अलौकिक शक्तियों के स्वामी होते हैं और वह यह शक्तियां अपने कठोर तप और भक्ति से हासिल करते हैं। पुराणों के अनुसार नागा साधु भगवन शंकर के गण माने जाते हैं। इसीलिए वह अपने शरीर पर हर वक्त भभूत लपेटे हुए रहते हैं। भगवन शंकर के गण होने की वजह से वह ज्यादा समय जंगलो में रहकर जड़ी-बूटी और कंदमूल के सहारे ही अपना पूरा जीवन काट लेते हैं।

बताया जाता है, कि प्रत्येक नागा साधु किसी न किसी अखाड़े से जुड़ा होता है। जब तक उनकी दीक्षा कार्यक्रम होता है, बह अखाड़े में पुनर्वास करते है, उसके बाद वह अखाडा छोड़ जंगलो और पहाड़ों की तरफ तपस्या करने के लिए निकल पड़ते हैं। कहते है, कि कुंभ के समय नागा साधुओं को निमंत्रण देने के लिए अखाड़ों की तरफ से कोतवाल की नियुक्ति की जाती है। जो कि सभी नागा साधुओ को कुंभ में शामिल होने के लिए निमंत्रण देते हैं। इसके बाद ही यह रहस्मयी तरिके से सही समय पर कुंभ में शामिल हो जाते हैं।

नागा साधु बनने के लिए इंसान को अपना सांसरिक जीवन त्याग कर दीक्षा लेनी होती है। नागा साधु का जीवन एक कठोर तपस्या के समान होता है। इसके लिए वह स्वयं का पिंडदान भी करते है। मान्यताओं के अनुसार ऐसा इसलिए किया जाता है, कि जिससे इंसान सांसारिक जीवन से मोह त्याग सिर्फ प्रभु की भक्ति में अपना ध्यान लगा सके। इसीलिए नागा साधु दीक्षा लेते समय अपने सर के बालो को मुंडवा कर स्वयं का पिंडदान करते है।

इसके पश्चात उनका अपने परिवार और सांसारिक चीजों से मोह भंग हो जाता है। और वह केवल भगवन शंकर की उपसना करने पहाड़ो पर चले जाते हैं। माना जाता है कि नागा साधु पृथ्वी लोक पर भगवन शंकर के गण की भूमिका निभाते हैं, और हिन्दू धर्म की रक्षा के सदैव तैयार रहते हैं।
















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